राज्य में कला, संस्कृति और धरोहर को संरक्षित रखने के लिए कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन अपनी भाषाई विरासत की हालत चिंताजनक है। जिन क्षेत्रीय भाषाओं की पहुंच नेपाल और मॉरीशस तक है, उनके संरक्षण और संवर्धन के लिए राज्य में न तो ठोस योजना है, न ही पर्याप्
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इन संस्थानों में 12 कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनमें 3 तृतीय वर्गीय और 9 चतुर्थवर्गीय हैं। इन्हें आज भी 1996 के वेतनमान के अनुसार तनख्वाह मिल रही है। 22 सितंबर 2022 को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में सभी भाषा अकादमियों को मिलाकर द बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ लोकल लैंग्वेज बनाने का निर्णय लिया गया था। इसमें बज्जिका और सुरजापुरी भाषा को भी जोड़ने और राष्ट्रभाषा परिसर में नया भवन बनाने का निर्देश दिया गया। लेकिन, तब से पांच बार शिक्षा मंत्री बदल चुके हैं। विधानसभा और परिषद में कई बार मामला उठने के बावजूद कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।
एकीकरण का वादा नहीं हो सका पूरा
भाषा विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यही स्थिति रही तो राज्य की भाषाई धरोहर न केवल संस्थागत रूप से बल्कि सांस्कृतिक स्मृति से भी विलुप्त होने लगेगी। वे मांग कर रहे हैं कि जल्द से जल्द ठोस कदम उठाए जाएं ताकि राज्य की यह अमूल्य विरासत बचाई जा सके।
लेखक और संस्कृति कर्मी अनीश अंकुर ने कहा कि पिछले दो-तीन दशकों से भाषाई अकादमी को हाशिए पर रख दिया गया है। इन अकादमी में न तो स्थायी समिति है, न ही फंड दिया जाता है। इनमें जो भी नियुक्तियां हुईं, उनमें साहित्य से जुड़े लोगों के बजाय ब्यूरोक्रेट्स को नियुक्त कर दिया गया। एक तरफ जहां हमारी क्षेत्रीय भाषाएं देश-दुनिया तक पहुंच बना रही हैं, वही अपने राज्य में ही इनके विकास के लिए कोई स्थायी प्रावधान नहीं है। यहां काफी लंबे समय से न किसी पुस्तक का प्रकाशन हुआ है और न ही कोई आयोजन हुआ है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।
अकादमियों में कार्यरत कर्मचारी
अकादमी पद कार्यरत
मैथिली अकादमी 21 3
भोजपुरी अकादमी 24 2
मगही अकादमी 15 2
बांग्ला अकादमी 16 1
संस्कृत अकादमी 14 3
अंगिका अकादमी 10 1
पुस्तकों का प्रकाशन बंद
फरवरी 1976 में मैथिली अकादमी की स्थापना के साथ क्षेत्रीय भाषाई अकादमियों का सफर शुरू हुआ। 1979 से लगातार 9 वर्षों तक यहां की पुस्तकों को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। मगर 2005 से हालात बिगड़ने लगे, क्योंकि तब से अबतक समितियों का पुनर्गठन नहीं हुआ है। 2019-20 के बाद प्रशासनिक मद में राशि आवंटित नहीं की गई। इस बीच सिर्फ संस्कृत अकादमी को 15 लाख रुपए दिए गए। नतीजतन अकादमियों की गतिविधियां लगभग ठप हो गईं। मैथिली अकादमी की लगभग 30-40 पुस्तकें विभिन्न विश्वविद्यालयों सहित बिहार लोक सेवा आयोग आैर संघ लोक सेवा आयोग मे सम्मिलित है। लेकिन, इनका प्रकाशन नहीं होने से छात्रों को दो-चार पुस्तकें ही उपलब्ध हो पा रही हैं। सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन का लाभ नहीं मिल रहा है। इसके कई मामले कोर्ट में चल रहे है।