West Bengal Defection Success Rate: बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण के लिए नामांकन का दौर खत्म हो चुका है. दूसरे चरण के लिए नामांकन जारी है. 23 और 29 अप्रैल को होने वाले वोट से पहले राज्य में एक बार फिर पाला बदलने का खेल चला. क्या आप जानते हैं कि बंगाल की राजनीति में दल बदलना घाटे का सौदा है या फायदे का? पिछले 3 विधानसभा चुनावों (2011, 2016 और 2021) के आंकड़े बताते हैं कि ‘दलबदलू’ उम्मीदवारों के लिए बंगाल का चुनाव फायदे का सौदा रहा है.
36 प्रतिशत है दलबदलुओं का सक्सेस रेट
आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन चुनावों में अपनी पुरानी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी के टिकट पर कुल 135 उम्मीदवार चुनाव के मैदान में उतरे. इनमें से 49 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की. इसका मतलब साफ है कि बंगाल में दलबदल करने वाले हर तीसरे उम्मीदवार को जनता ने सिर माथे पर बिठाया. ऐसे प्रत्याशियों का ‘सक्सेस रेट’ करीब 36 प्रतिशत रहा है.
West Bengal Defection Success Rate: साल-दर-साल बढ़ा दलबदल का क्रेज
आंकड़ों पर गौर करने से पता चलता है कि दलबदल कर चुनाव लड़ने वाले नेताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. पिछले 3 चुनावों के डेटा पर आप भी जरा गौर कीजिए.
- 2011 का बंगाल चुनाव : 30 उम्मीदवारों ने दल बदला. इनमें से 10 जीते.
- 2016 का बंगाल चुनाव : 41 उम्मीदवारों ने पाला बदला. इनमें से 13 को जीत मिली.
- 2021 का बंगाल चुनाव : इस साल सबसे ज्यादा दलबदलुओं ने चुनाव लड़ा. 64 उम्मीदवार दूसरी पार्टी से आये और रिकॉर्ड 26 ने जीत दर्ज की.
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TMC और BJP की पहली पसंद बने ‘टर्नकोट्स’
बंगाल की दो सबसे बड़ी पार्टियों ने टर्नकोट्स यानी दलबदलुओं पर सबसे ज्यादा भरोसा जताया. अब तक जीतने वाले 49 दलबदलुओं में से 37 ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के टिकट पर जीत हासिल की, जबकि 8 ने भाजपा (BJP) के चुनाव चिह्न पर परचम लहराया. 2021 का बंगाल चुनाव भाजपा के लिए खास था, क्योंकि पहली बार उसके टिकट पर 8 दलबदलुओं ने विधानसभा में एंट्री मारी.
शुभेंदु अधिकारी : दलबदल का सबसे बड़ा उदाहरण
वर्ष 2021 के दलबदल की चर्चा हो और शुभेंदु अधिकारी के नाम को नजरअंदाज कर दिया जाये, बंगाल की राजनीति में यह मुमकिन नहीं. 2021 में उन्होंने टीएमसी छोड़कर भाजपा का दामन थामा और नंदीग्राम की हाई-प्रोफाइल सीट पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को मात दी. इसी तरह बशीरहाट उत्तर विधानसभा सीट से रफीकुल इस्लाम मंडल ने 2016 में सीपीआईएम के टिकट पर जीत दर्ज की थी और 2021 में टीएमसी में शामिल होकर दोबारा विधायक बने.
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बंगाल में घाटे का सौदा नहीं है पाला बदलना
आंकड़े स्पष्ट बता रहे हैं कि बंगाल विधानसभा चुनाव में पाला बदलना जोखिम भरा तो है, लेकिन यह कोई घाटे का सौदा नहीं है. यही वजह है कि 2026 के चुनाव से पहले कई नेताओं ने दलबदल किये. हालांकि, सभी को विधानसभा चुनाव लड़ने का टिकट नहीं मिला है, लेकिन कई ऐसे नेता हैं, जिनको इस बार भी नयी पार्टी ने उम्मीदवार बनाया है.
- मौसम नूर : एबीए गनी खान चौधरी की बहन की बेटी हैं. कांग्रेस छोड़कर लंबे समय तक ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस में रहीं. चुनाव से पहले उन्होंने फिर से कांग्रेस में लौटने का फैसला किया और अब मालतीपुर से विधानसभा का चुनाव लड़ रहीं हैं.
- संतोष पाठक: लंबे समय तक कांग्रेस की राजनीति करने वाले कोलकाता के नेता संतोष पाठक 2026 का बंगाल विधानसभा चुनाव भाजपा के टिकट पर लड़ रहे हैं. भगवा दल ने उन्हें चौरंगी से टिकट दिया है.
- आशुतोष बर्मन: वर्षों तक अलग कूचबिहार राज्य की मांग करने वाले ग्रेटर कूचबिहार पीपुल्स एसोसिएशन (GCPA) के बंशीबदन बर्मन गुट के राजवंशी नेता आशुतोष बर्मन अब भाजपा के साथ हैं. उन्हें पार्टी ने सिताई से अपना उम्मीदवार बनाया है.
- गिरिजा शंकर रॉय : इसी संस्था के एक और नेता हैं गिरिजा शंकर रॉय. भाजपा ने उन्हें नाटाबाड़ी विधानसभा सीट से टिकट दिया है.
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